LRC歌词

दिलो में नफ़रत ज़ुबाँ पे शो'ले घरों में सामाँ-ए-क़त्ल क्यूँ है
है तपती रूहों में अश्क धारे यहाँ पे इतने 'अज़ाब क्यूँ है
दिलो में लालच ज़ुबाँ पे नाले घरों में तेरे रिश्वत की रस्में
दु'आ में शर्तें शर्तों में तक़ाज़े ये मज़हबों का व्योपार क्यूँ है
क्यूँ है
क्यूँ है
सभी के दामन पे दाग़ क्यूँ है
क्यूँ है
क्यूँ है
सभी की रूहें क्यूँ दबी हुई है
मंज़र है जंग-ए-बारूद-ओ-तुफ़ंग इंसाँ का ख़ूँ इतना सस्ता क्यूँ है
गर हालत तेरे जहाँ की ये है तो दिल तेरा इतना सख़्त क्यूँ है
मुल्कों की सरहदें सरहदों की जंग ये वहशत-ए-जुनूँ क्यूँ है
तेरी ये दुनिया बिखर ना जाए तुझे ये क़ुबूल है तो ये क्यूँ है
कहीं है मंदिर कहीं है मस्जिद कहीं है का'बा-ओ-कलीसा बहुत
पर कहाँ है तेरा ठिकाना कहीं पे तेरा नाम-ओ-निशाँ क्यूँ नहीं है
क्यूँ है
क्यूँ है
सभी के दामन पे दाग़ क्यूँ है
क्यूँ है
क्यूँ है
सभी की रूहें क्यूँ दबी हुई है
कभी तू का'बे से निकलकर कभी तो बंदों की फ़िक्र तू कर ले
ख़ुदा तू ये कैसा ख़ुदा है कुछ नहीं तो दा'वा ख़िल्क़त का क्यूँ है

文本歌词

दिलो में नफ़रत ज़ुबाँ पे शो'ले घरों में सामाँ-ए-क़त्ल क्यूँ हैहै तपती रूहों में अश्क धारे यहाँ पे इतने 'अज़ाब क्यूँ हैदिलो में लालच ज़ुबाँ पे नाले घरों में तेरे रिश्वत की रस्मेंदु'आ में शर्तें शर्तों में तक़ाज़े ये मज़हबों का व्योपार क्यूँ हैक्यूँ हैक्यूँ हैसभी के दामन पे दाग़ क्यूँ हैक्यूँ हैक्यूँ हैसभी की रूहें क्यूँ दबी हुई हैमंज़र है जंग-ए-बारूद-ओ-तुफ़ंग इंसाँ का ख़ूँ इतना सस्ता क्यूँ हैगर हालत तेरे जहाँ की ये है तो दिल तेरा इतना सख़्त क्यूँ हैमुल्कों की सरहदें सरहदों की जंग ये वहशत-ए-जुनूँ क्यूँ हैतेरी ये दुनिया बिखर ना जाए तुझे ये क़ुबूल है तो ये क्यूँ हैकहीं है मंदिर कहीं है मस्जिद कहीं है का'बा-ओ-कलीसा बहुतपर कहाँ है तेरा ठिकाना कहीं पे तेरा नाम-ओ-निशाँ क्यूँ नहीं हैक्यूँ हैक्यूँ हैसभी के दामन पे दाग़ क्यूँ हैक्यूँ हैक्यूँ हैसभी की रूहें क्यूँ दबी हुई हैकभी तू का'बे से निकलकर कभी तो बंदों की फ़िक्र तू कर लेख़ुदा तू ये कैसा ख़ुदा है कुछ नहीं तो दा'वा ख़िल्क़त का क्यूँ है

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